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hai ye duniyaa kaun sii ai dil mujhe kyaa ho gayaa

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है ये दुनिया कौन सी ऐ दिल मुझे क्या हो गया
जैसे मन्ज़िल पर कोई आके मुसाफ़िर खो गया
है ये दुनिया कौन सी ऐ दिल मुझे क्या हो गया ...

मैं हूँ इक पंछी अकेला इस गगन की छाओँ में (२)
उड़ते उड़ते आगया हूँ बादलों के गाओं में
अपने ही सपनों की धुन में चलते चलते सो गया
है ये दुनिया कौन सी ऐ दिल मुझे क्या हो गया ...

सुन भी लो ग़म की सदायें दर्द का पैग़ाम लो (२)
डगमगाते जा रहे हैं आके हमको थाम लो
फिर ना कहना ज़िंदगी का आसरा गुम हो गया
है ये दुनिया कौन सी ऐ दिल मुझे क्या हो गया ...

Comments/Credits:

			 % Transliterator: Ravi Kant Rai (rrai@ndsun.cs.ndsu.nodak.edu)
% Editor: Anurag Shankar (anurag@astro.indiana.edu)
		     
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