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kyaa Kabar thii terii mahafil se nikalanaa hogaa

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क्या ख़बर थी तेरी मह्फ़िल से निकलना होगा
दिल न चाहे गा मगर आग पे चलना होगा

शमा इक रात जला कर्ती है लेकिन मुझ को
उम्र भर के लिये चुप चाप पिघलना होगा

छीन ली पयार की ठन्डक तो ज़माने ने कहा
तुझ को इक आतिश-ए-गुमनाम में जलना होगा

बन्द हैं मौत की राहें भी असीरों के लिये
जाने इस क़ैद से अब कैसे निकलना होगा

आसमां वाला अगर मेरा ख़ुदा है तो उसे
अपनी दुनिया के रिवाजों को बदलना होगा

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